Saturday, April 8, 2017

अमर क्रन्तिकारी भगत सिंह +रमेशराज




अमर क्रन्तिकारी भगत सिंह

+रमेशराज
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        युग-युग से पंजाब वीरता, पौरुष और शौर्य का प्रतीक रहा है। सिखों के समस्त दस गुरु अपनी आन पर मर मिटने, पराधीनता न स्वीकार करने और अत्याचारी मुगलों से टक्कर लेने के कारण आज भी जन-जन के बीच श्रद्धेय हैं। लाला हरदयाल की प्रेरणा से ‘गदर पार्टी’ का निर्माण कर अंग्रेजी साम्राज्य चूलें हिला देने वाले सोहन सिंह भकना, करतार सिंह, बलवन्त सिंह, बाबा केसर सिंह, बाबा सोहन सिंह, बाबा बसाखा सिंह, भाई संतोख सिंह, दिलीप सिंह, मेवा सिंह जैसे अनेक रणबाँकुरे सिखों की जाँबाजी की शौर्य-गाथाएँ पंजाब के ही हिस्से में आती हैं।
‘जलियाँवाला बाग’ में सैकड़ों सिखों की शहादत, लाला लाजपतराय का ‘साइमन-कमीशन-विरोध’ इतिहास के पन्नों में यदि दर्ज है तो दूसरी ओर स्वतन्त्रता की नई भोर लाने के लिए पंजाब के लायलपुर के एक गाँव बंगा के एक सिख खानदान का योगदान अविस्मरणीय है। इसी खानदान के वीर अर्जुन सिंह ने अंग्रेजी शासन की बेडि़याँ तोड़ने और पराधीन भारतमाता को आजाद कराने के लिए म्यान से बाहर तलवारें खींच लीं। सरदार अर्जुन सिंह के तीन बेटे किशन सिंह, अजीत सिंह, स्वर्ण सिंह भी देशप्रेम के दीवाने होकर अंग्रेजी हुकूमत को टक्कर देते रहे।
इसी बहादुर परिवार में एक बच्चे ने जन्म लिया। बच्चे की माँ चूकि पूजा-पाठ करने वाली ‘भगतिन’ थी, अतः बालक का नाम रखा गया- सरदार भगत सिंह।
भगत सिंह के पिता एक दिन खेत में गेंहूँ बो रहे थे। उस समय बच्चे भगत ने खेत में कारतूस बोकर यह सिद्ध कर दिया कि वह भी बाबा और पिता के आदर्शों पर चलकर अंग्रेजों की गुलामी की बेडि़यों से भारत को आजाद कराने में अपने प्राणों की बाजी लगाएगा।
उच्च शिक्षा ग्रहण करते समय भगत सिंह क्रान्तिकारी गतिविधियों में संलग्न ही नहीं रहे बल्कि देश-भर के क्रान्तिकारियों को संगठित कर एक दल ‘हिन्दुस्तानी समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना’ का गठन भी किया।
जब ‘साइमन कमीशन’ का विरोध कर रहे लाला लाजपतराय पर साण्डर्स ने बेरहमी के साथ लाठीचार्ज किया तो लाला लाजपतराय की मौत का बदला लेने के लिए साण्डर्स का वध कर भगत सिंह ने यह दिखला दिया कि अभी भारत-भूमि वीरों से खाली नहीं हुई है।
भगत सिंह सच्चे अर्थों में मजदूरों, गरीबों, किसानों, बुनकरों आदि के हितैषी थे। वे एक ऐसे भारत के निर्माण का सपना देखते थे जिसमें न किसी प्रकार का शोषण हो और न कोई आर्थिक असमानता। तिलक, सुभाष, लाला लाजपत राय की तरह ही वे गाँधीजी को वास्तविक आजादी का छद्म योद्धा मानते थे और उनकी अहिंसा को कोरा पाखण्ड बतलाते थे।
अपनी क्रान्तिकारी विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाने और बहरी अंग्रेज हुकूमत के कान खोलने के लिए 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त्त और सुखदेव के साथ एसेम्बली में बम से धमाका कर साइमन साहब, वायसराय, सर जार्ज शुस्टर को ही नहीं इंग्लेंड को भी हिलाकर रख दिया। बिना कोई नुकसान किये किसी साम्राज्य को कैसे हिलाया जा सकता, यह नजारा हॉल में बैठे क्रांग्रेस के दिग्गज नेता पण्डित मोतीलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना और पण्डित मदन मोहन मालवीय ने भी देखा।
बम से धमाका करने, ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’ के नारे लगाने और बहरी सरकार के खिलाफ पर्चे फेंकने के बाद भगत सिंह चाहते तो वहाँ से आसानी से बच निकल सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा न कर, गिरफ्तार होना ही उचित समझा।
23 मार्च, 1931 का वह सबसे दुर्र्भाग्यपूर्ण दिन। जेल की कोठरी में एडवोकेट प्राणनाथ मेहता से प्राप्त ‘लेनिन का जीवन-चरित्र’ नामक पुस्तक को भगत सिंह पूरी तन्मयता से पढ़ रहे थे, जबकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात था कि आज का दिन उनके जीवन का अन्तिम दिन है। मृत्यु के भय से परे भगत सिंह ने कुछ ही समय पूर्व अपने प्रिय रसगुल्ले मँगाकर उनका स्वाद चखा। ऐसा लग रहा था जैसे वे मौत के आतंक से इतनी दूर हों, जितना पृत्वी से आकाश। उस वक्त यदि कोई उनके पास था तो वह था महान क्रन्तिकारी लेनिन का व्यक्तित्व।
भगत सिंह पुस्तक के कुछ ही पन्ने पढ़ पाये थे कि उनकी कालकोठरी में चमचमाती यूनीफार्म पहने जेलर दाखिल हुआ। उसने कहा-‘‘अब आपको फाँसी पर चढ़ाने का हुकुम है, आप तैयार हो जाएं।’’
भगत सिंह के दाहिने हाथ में पुस्तक थी, उन्होंने पुस्तक से अपनी आँखें न उठाते हुए अपने दूसरे हाथ से जेलर की ओर इशारा करते हुए कहा-‘‘ठहरो, एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल रहा है, क्या आप लोग इतना भी समय नहीं देंगे कि हम भारतीय विदेशों में बह रही क्रान्ति की हवा में भी साँस न ले सकें।’’
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1857 के विद्रोह’ की नायिका रानी लक्ष्मीबाई +रमेशराज




1857 के विद्रोह’ की नायिका रानी लक्ष्मीबाई

+रमेशराज
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दूसरों की जूठन खाने वाले कौआ, गिद्ध या श्वान सौ नहीं पांच सौं वर्ष जीवित रहें लेकिन वह शौर्य, प्रशंसा और श्रेष्ठ वस्तुओं के अधिकारी नहीं हो सकते और न इनका इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जा सकता है। किन्तु सिंह की तरह केवल दो चार वर्ष ही जीवित रहने वाले व्यक्ति की शौर्य-गाथाएं युग-युग तक यशोगान के रूप में जीवित रहती हैं। इतिहास में वही आत्म बलिदानी दर्ज हो पाते हैं, जिनमें आत्म-बल, अपार धैर्य शक्ति और स्वयं को आहूत कर देने का अदम्य साहस होता है।
     ‘1857 के विद्रोह’ की नायिका रानी लक्ष्मीबाई यद्यपि 24 वर्ष ही जीवित रहीं और उन्होंने केवल 9 माह की झांसी पर शासन किया। किन्तु रानी के शासन के ये 9 माह इस बात के गवाह हैं कि साम्प्रदायिक सदभाव, प्रजा सेवा, कुशल रणनीति, अपूर्व साहस की एक ऐसी मिसाल थीं जो इतिहास में दुर्लभ है।
अंग्रेजों से विद्रोह करने वाले अनेक राजघरानों के राजा महाराजा, नवाब और जमींदार 1857 की क्रान्ति में वह स्थान न पा सके जिस स्थान पर आज इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई खड़ी हैं। वे इसलिए सबसे महान और बड़ी हें क्योंकि अपने अद्भुत रणकौशल के बल पर उन्होंने हर पराजय के समय भी अंग्रेजों और उनकी सेना को गाजर-मूली की तरह काटते हुए, एक नहीं अनेक अवसरों पर विजय में तब्दील कर दिया। रानी लक्ष्मीबाई की वीरता और उनके अदम्य साहस की उनके घोर दुश्मन और उनके खिलाफ युद्ध लड़ने वाले अंग्रेजी सेना के अफसर हयूरोज भी कह उठते हैं-‘‘शत्रु-दल में अगर कोई सच्चा मर्द था तो वह झांसी की रानी ही थी।’’
अपने शत्रु से भी अपनी तारीफ करा लेने वाली रानी लक्ष्मीबाई शुरू में भले ही अंग्रेजी साम्राज्य के प्रति कोमल भावना रखती हों लेकिन जब उनकी अंग्रेजों से ठन गयी तो उन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य को पूरे भारतवर्ष से जड़ से उखाड़ फैंकने का जो संकल्प लिया उससे वे कभी पीछे नहीं हटीं।
रानी लक्ष्मीबाई बाल्यावस्था से ही अपार पराक्रमी, तेजस्वी, और अपनी बात पर अडिग रहने वाली स्त्री थी। उनका बाल्यकाल का नाम मनुबाई था। मनुबाई को बचपन से ही घुड़सवारी और विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने का शौक था। लगभग 8 वर्ष की अवस्था में उनका विवाह झांसी के महाराज गंगाधर राव से हो गया। विवाह के 8 वर्ष बाद सन् 1851 में उसने एक पुत्र को जन्म दिया किन्तु राजा और रानी का दुर्भाग्य कि वह भी चल बसा। पुत्र वियोग के कारण महाराज गंगाधर को संताप और शोक ने घेर लिया। उनकी तबियत निरंतर बिगड़ती गयी और वे एक दत्तक पुत्र को गोद लेने की घोषणा के कुछ दिनों बाद ही 21 नवम्बर 1853 को परलोक सिधार गये |
गंगाधर राव के मरते ही अंग्रेज मेजर एलिस ने झांसी के खजाने पर ताला लगा दिया और 27 फरवरी 1854 को झांसी के राज्य को ब्रिटिश शासन में मिला देने की घोषणा कर दी गयी और दत्तक पुत्र दामोदर राव को झांसी के उत्तराधिकारी के रूप में अमान्य घोषित कर दिया गया। यहीं नहीं कानपुर और झांसी में  4 जून को जो सैन्य विद्रोह हुआ, जिसमें विद्रोहियों के नेता काले खां और तहसीलदार अहमद हुसैन ने अपने प्रधान अफसर कप्तान डनलप और टेलर के साथ-साथ 74 अंग्रेज पुरुष, 16 स्त्रियों और 23 बच्चों को झांसी में मौत के घाट उतार दिया और झांसी के किले पर कब्जा कर लिया और बाद में ‘‘खल्क खुदा, मुल्क बादशाह का, अमल महारानी लक्ष्मीबाई का’’  नारा लगाते हुए दिल्ली की ओर कूच कर गये तो इस अंग्रेजी की सेना के सैन्य विद्रोह और अंग्रेजों के कत्लेआम के लिये अंग्रेजों ने हर प्रकार के दोष लक्ष्मी बाई के सर मढ़ दिये। इससे पूर्व भले ही रानी को मजबूरी में ही सही पर इन्ही किले में निवासी अंग्रेजों की हर सम्भव सहायता करती थी यहां तक कि तीन-तीन मन आटे की रोटियां पकवाकर उन्हें भिजवाती थी | किन्तु इन अंग्रेजों का कत्लेआम होने के बाद जब वहां कोई अंग्रेज न रहा तो रानी ने सम्पूर्ण झांसी का प्रबन्धन अपने हाथ में ले लिया।
रानी लक्ष्मीबाई को जून 1857 से मार्च 1858 तक नौ महीने ही  शासन करने का अवसर मिला लेकिन इस दौरान शासक के रूप में उसने अपने घर के शत्रुओं जैसे सदाशिव राव नाम व्यक्ति जो अपने को  गंगाधर राव का निकट सम्बन्धी बतला झांसी की गद्दी हड़पना चाहता था, युद्ध में परास्त कर गिरफ्तार किया। ओरछा के दीवान नत्थे खाँ ने अंग्रेजों के इशारे पर जब झांसी पर चढ़ाई की तो उसे भी पराजित कर ओरछा जाने को विवश कर दिया।
रानी के इस पराक्रम को देख उस घर के या अन्य-राज्यों के राजाओं की रानी से टक्कर लेने की तो फिर हिम्मत नहीं हुई किन्तु 19 मार्च 1858 को झांसी के नजदीक चंयनपुर नामक स्थान पर पड़ाव डालने के उपरांत 20 मार्च की सुबह जब सर ह्यरोज अपनी सेना को लेकर झांसी पहुंचा और जिस समय रानी से उसका युद्ध हुआ तो रानी ने अपने गुरु तात्याटोपे, सेनापति रघुनाथ हरी नेवालकर, गोशखान, अपने भाई कर्मा आदि के साथ 13 दिन तक युद्ध लड़ा | उस युद्ध का वर्णन एक अग्रेज अफसर डॉ. लो ने इस प्रकार किया है-
‘‘शत्रु की अत्यधिक अग्निवर्षा, बन्दूकों और तोपों की गड़गड़ाहट, अग्निवणों की सरसराहट, बड़े-बड़े पत्थरों को लुड़काने से होती भयावह धमाके और भारी-भारी पेड़ों के नीचे लुढ़कने की ध्वनि से जो प्रलय उत्पन्न हुई उससे अंग्रेजी सैनिकों के पांव उखड़ने लगे।’’
अग्रेजों के साथ 13 दिन निरंतर हुए युद्ध में आखिर अंगे्रज जब किले पर कब्जा करने में कामयाब हो गये तो रानी मर्दानी पोशाक पहनकर और अपने दत्तक पुत्रा दामोदर को पीठ पर पटके से बांधकर अपने दो सौ सिपाहियों के साथ कालपी चल दी। झांसी से 21 मील दूर भांडेर के पास उसने अपना पीछा करने वाले अंग्रेज अफसर कप्तान वाॅकर को घोड़ा दौड़कर धराशायी कर दिया और वे 24 घंटे में 102 मील का रास्ता पार कर कालपी पहुंच गयीं।
अंग्रेज अफसर ह्यूरोज ने 15 मई को कालपी में फिर रानी को घेर लिया। वहां अपने सैनिकों और विद्रोहियों को लेकर गुलौली के पास रानी का अंग्रेजों से फिर भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में रानी के साथ लड़ रहे विद्रोही सैनिकों के टूटते मनोबल को देखते हुए जब रानी ने कालपी के किले को सुरक्षित नहीं समझा तो उसने ग्वालियर की ओर प्रस्थान कर दिया और ग्वालियर जाकर अंग्रेजभक्त शासक जीजाजी राव और दिनकर राव को किले से बाहर खदेड़कर ग्वालियर का किला अपने कब्जे में ले लिया।
16 जून को ह्यूरोज अपनी सेना लेकर ग्वालियर के निकट मोरार में आकर फिर रानी को घेरने लगा। रानी ने विद्रोही सैन्यदल को उसका मुकाबला करने भेजा | किन्तु यह सेना केवल दो घंटे में ही पराजित हो गयी। यही नहीं कुछ ग्वालियर के विद्रोही सैनिक फिर अंग्रेजों से जा मिले। यह अप्रत्याशित और अत्यंत विपरीत दशा देखकर रानी 17 जून को ग्वालियर के निकट ‘कोटा की सराय’ नामक स्थान पर स्वयं रणक्षेत्र में कूद पड़ी। इस भीषण संग्राम में जहां रानी ने अनेक अंग्रेज अफसरों और सैनिकों को चारे की तरह काटा, वहीं अंग्रेजों की भीषण गोली-वर्षा के बीच उसके घोड़े को कई गोलियां लगीं। नाले को फांदने की कोशिश में वह पैर फिसल जाने के कारण गिर पड़ा। इसी बीच एक अंग्रेज सवार ने उसके नजदीक जाकर तलवार से रानी के चेहरे का आधा भाग काट डाला। घायल रानी ने पलटकर उस सवार पर ऐसा वार किया कि वह वहीं ढेर हो गया।’
घावों से अत्यधिक खून बहने के कारण रानी को उनका सरदार एक झोंपड़ी में ले गया। वहां उसने गंगाजल पिया और भारतमाता की जय बोलते हुए अपने प्राण त्याग दिये। कौन नहीं करेगा ऐसी वीरांगना पर गर्व | कौन नहीं बोलेगा- रानी लक्ष्मीबाई की जय?
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आज़ादी की जंग में यूं कूदा पंजाब +रमेशराज




आज़ादी की जंग में यूं कूदा पंजाब 

+रमेशराज
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गुलामी की जंजीरों में जकड़े हिन्दुस्तान को आजाद कराने में अपने प्राणों को संकट में डालकर लड़ने वाले रणबांकुरों में एक तरफ जहां पं. चन्द्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, गणेश शंकर विद्यार्थी, गेंदालाल दीक्षित, पं. रामप्रसाद बिस्मिल, सूर्यसेन, सुभाष चन्द्र बोस, तिलक, विपिन चन्द्र पाल, खुदीराम बोस, रानी लक्ष्मीबाई, मंगल पाण्डेय, बेगम हसरत महल आदि का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित है, वही पंजाब की माटी ने भी ऐसे एक नहीं अनेक सपूतों को जन्म दिया है जिन्होंने अंग्रेजों के साम्राज्य को ढाने में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया।
देखा जाय तो अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाने वालों में सिखों का नाम ही सबसे पहले आता है। भले ही सिखों के आंदोलन धार्मिक रंग लिये होते थे, किन्तु इन्हीं आयोजनों से अंग्रेजों की नींद हराम होती थी। 13 अप्रैल 1919 बैसाखी के दिन गुरू गोविंद सिंह के अमृतपान की स्मृति से जुड़ा पवित्र दिन आजादी के इतिहास में ऐसा ही धार्मिक उत्सव था। उस दिन जलियांवाला बाग में मनाये गये उत्सव के समय अंग्रेजों की गोलियों से 309 देशभक्तों को सदा-सदा के लिये विदा कर दिया। जलियांवाला कांड के शहीदों में सर्वाधिक सिख ही थे।
उस समय ऐसा कोई राष्ट्रीय आंदोलन नहीं था जिसमें सिखों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा न लिया हो। स्वदेशी, खिलाफत, बंग-भंग, भारत छोडो आंदोलनों के दौरान सिखों ने अपने प्राण संकट में डाले, जेलों में सड़े, तरह-तरह की यातनाएं झेलीं।
 आजादी की लडाई में सिखों का योगदान सन् 1863 से शुरू होता है। सिखों ने भाई रामसिंह के नेतृत्व में ‘कूका’ आंदोलन प्रारम्भ किया। ‘कूका’ सम्प्रदाय के लोग स्वदेशी के पक्षधर थे। यह एक अर्धसैनिक संगठन था जिसमें अस्त्र-शस्त्र चलाने की बाकायदा ट्रेनिंग दी जाती थी।
ये लोग खादी पहनते और सादा जीवन व्यतीत करते थे। अंग्रेजी संस्कृति के कट्टरविरोधी इन ‘कूका’ सम्प्रदाय के लोगों ने जब अंग्रेजों की नीतियों का विरोध किया तो इनकी भिडंत गोरों की फौज से हो गयी। अंग्रेजों ने 66 कूकों को लुधियाना और 12 को मालेर कोटला में तोपों से बांधकर उड़ा दिया। इनके नेता रामसिंह को गिरफ्तार कर वर्मा भेज दिया | जहां वे अपनी मातृभूमि के लिए तड़पते हुए 1895 में स्वर्ग सिधार गये।
‘पंजाब  कालोनाइजेशन एक्ट- 1907’ के विरुद्ध सिखों ने जिस प्रकार प्रर्दशन किया, वह भी इतिहास में एक मिसाल है। इस आंदोलन के दौरान ही बांकेदयाल नामक क्रांतिकारी ने प्रसिद्ध पंजाबी गीत ‘पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल ओये’ लिखा था। इस गीत को सरदार अजीत सिंह, लाला लाजपतराय, स्वामी श्रद्धानंद और बाद में सरदार भगत सिंह की टोली बड़े जोश भरे अंदाज में गाती थी। पंजाब कालोनाइजेशन एक्ट- 1907 के विरुद्ध आंदोलन छेड़ने वाले शीर्ष नेता थे सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपतराय, जिन्हें सरकार ने गिरफ्रतार कर माडले जेल में लम्बे समय तक रखा।
‘जलियांवाला बाग’ के क्रूर हत्यारों के अफसर और ‘साइमन कमीशन’ का विरोध करते समय लाठीचार्ज का आदेश  देकर लाला लाजपतराय की मौत का कारण बने सांडर्स से बदला लेने वाले ऊधम सिंह और भगत सिंह का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।
लाला हरदयाल की प्रेरणा से सोहन सिंह भकना ने अंग्रेजों की सत्ता को नेस्तनाबूत करने के लिए ‘गदर पार्टी’ का गठन किया। गदर पार्टी के पंजाबी रणबांकुरे करतार सिंह, बलवंत सिंह, भाई भाग सिंह, भाई वतन सिंह, लाला हरदयाल, बाबा सोहन सिंह, बाबा केसर सिंह, बाबा पृथ्वी सिंह, बाबा करम सिंह, बाबा बसाखा सिंह, भाई संतोख सिंह, दलीप सिंह, मेवा सिंह जैसे अनेक सिख जाबांजों ने अमेरिका में रहते हुये भारत माता को आजाद कराने के लिये अंग्रेजों के विरुद्ध अलख जगा कर अपनी जान की बाजी लगाई। उन दिनों गदर पार्टी अमेरिका के अलावा शंघाई, हांगकांग, फिलीपींस तक फैली हुयी थी। गदर पार्टी सशस्त्र क्रांति में विश्वास रखती थी। शुरू में इसका नाम ‘हिन्दी एसोशिएसन’ रखा गया। बाद में यह गदर पार्टी में तब्दील हो गयी। इस पार्टी ने अपने संघ का दफ्तर ‘युगांतर आश्रम’ के नाम से खोलकर ‘गदर’ नामक अखबार निकालने के लिए ‘गदर प्रैस’ की स्थापना की । ‘गदर’ अखबार ने पूरी दुनिया में अत्याचार, शोषण, साम्राज्यवाद के विरुद्ध गदर मचा दिया। इस पार्टी के अधिकांश जांबाज या तो गोलियों से भून दिये गये या फांसी पर लटका दिये गये।
गदर पार्टी से गोरी सरकार को कितना खतरा बन चुका था, इस बारे में तत्कालीन पंजाब के गवर्नर माइकल ओडायर लिखते हैं- ‘‘ हिन्दुस्तान में केवल तेरह हजार गोरी फौज थी जिसकी नुमाइश सारे हिन्दुस्तान में करके सरकार के रौब को कायम करने की चेष्टा की जा रही थी। ये भी बूढ़े थे। यदि ऐसी अवस्था में सैनफ्रैन्सिको से चलने वाले ‘गदर पार्टी के सिपाहियों की आवाज मुल्क तक पहुंच  जाती तो निश्चत है कि हिन्दुस्तान अंग्रेजों के हाथ से निकल जाता। ’’
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सत्तावन की क्रांति का ‘ एक और मंगल पांडेय ’ +रमेशराज




सत्तावन की क्रांति का ‘ एक और मंगल पांडेय ’

+रमेशराज
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1857 में अंग्रेजों के खिलाफ सैन्य विद्रोह करने वालों में मंगल पांडेय का नाम ही अब तक सुर्खियों में आता रहा है,  जबकि मंगल पांडे के अलावा भी ऐसे कई क्रांतिवीर पैदा हुए,  जिनके नेतृत्व में एक नहीं अनेक स्थानों पर सामूहिक सैन्य विद्रोह हुआ।
          1857 के विद्रोह के इतिहास पर यदि हम गौर करें तो पता चलता है कि बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में एक तरफ अवध, रुहेलखण्ड,  नीमच,  पंजाब सहित अन्य प्रांतों में भी अंग्रेजी सेना के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के विरुद्ध बगावत का झण्डा बुलंद किया था। लखनऊ रेजीडेंसी पर 87 दिन तक अग्रेजों के खिलाफ जो सैन्य विद्रोह हुआ उसमें लगभग सात सौ विद्रोही मारे गये थे।
          विद्रोह की यह आग कथित तौर पर भले ही गाय और सूअर की चर्बी लगे कारतूसों के कारण भड़की हो, लेकिन यह विद्रोह सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ था। योजनाबद्ध तरीके अंग्रेजों के खिलाफ उनकी सेना को भड़काने का कार्य अलीगढ़ के एक सैनिक पंडित भीष्म नारायण ने भी किया।
          पंडित भीष्म नारायन जो भीके नारायन के नाम से भी मशहूर थे, का जन्म मथुरा जनपद के सादाबाद-सहपऊ मार्ग के मध्य स्थित गांव खोड़ा मढ़ाका के विख्यात लाठा-पचौरी परिवार में हुआ था। यह परिवार उस काल में बहादुरी और योग्यता के लिये दूर-दूर  तक विख्यात था। 1857 से पूर्व यह परिवार क्रान्तिकारी गतिविधियों का केन्द्र बन चुका था। इसी परिवार की सक्रियता के चलते स्वतंत्रता संग्राम के बीजों का अंकुरण 1856 में मथुरा के घने जंगलों में किया गया। यहां भादों माह में देश के अनेक क्रान्तिकारी एकत्रित हुए। इस बैठक में तात्याटोपे, अजीमुल्लाह, रंगोबाबू बादशाह, बहादुर शाह जफर के शहजादे मीर इलाही आदि ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह की रणनीति बनायी। इस बैठक का आयोजन हिन्दू संत खुशाली राम कजरौटी वाले ने किया। इतिहास लेखक पं. सच्चिदानंद उपाध्याय ने लिखा है कि खुशाली राम ने 1857 की क्रान्ति से बहुत पहले उ.प्र. के अतिरिक्त बंगाल और बिहार का दौरा करते हुए जब सन् 1856 में अलीगढ़ तथा बुलंदशहर की अंग्रेजी फौज में देशभक्ति का जज़्बा भर कर अंग्रेजों को हिन्दुस्तान से खदेड़ने की बात कर रहे थे, तभी बुलंदशहर में एक अंग्रेज फौजी अफसर ने उनकी हत्या कर दी।
          पंडि़त भीष्म नारायन उर्फ भीके पंडि़त इसी देश भक्त संत खुशाली राम के रिश्तेदार थे और इसी संत के कहने पर अंग्रेजों की सेना में ‘आजादी के विशेष उद्देश्य की पूर्ति’ हेतु भर्ती हुए थे। चूकि भीके नारायन का भी उद्देश्य अंग्रेजी सेना में सेवारत हिन्दुस्तानी सिपाहियों में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह की भावना का संचार करना था, अतः उन्होंने इस क्रांतिकारी कार्य को पूर्णता प्रदान करने के लिए अपना कार्य क्षेत्र बुलंदशहर चुना और वहां महीनों तक अपनी गुप्त गतिविधियां जारी रखीं। जब वे बुलंदशहर में अंग्रेजों की फौज की यूनिट में देशभक्ति की भावना भर रहे थे, उसी समय उनके किसी देशद्रोही अंग्रेजभक्त साथी ने अंग्रेज अफसरों से शिकायत कर गिरफ्तार करा दिया गया। उन्हें अलीगढ़ लाया गया और उन पर कोर्ट मार्शल किया गया। बीस मई 1857 को फांसी पर चढ़ाने का फरमान जारी किया गया।
फांसी के समय और उसके बाद फैली बगावत का वर्णन करते हुए प्रख्यात क्रान्तिकारी सावरकर लिखते हैं कि ‘‘20 मई की संध्या को जब भीके नारायण को वधमंच पर लाया गया तब इस ब्राह्मण ने अग्निमय भाषण दिया और हंसते-हंसते मृत्यु को अपने गले लगा लिया। फांसी के पूर्व शब्द-रक्त की जो अविरल धारा इस ब्राह्मण के मुख से अग्नि का रूप धारण कर प्रकट हुई वह आसपास खड़े अग्रेज सत्ता के भारतीय सैनिकों में बिजली की तरह कौंध गयी। चारों ओर खड़े सैनिक क्रोध से पागल होकर घनगर्जन करने लगे, ‘फिरंगी राज्य की अर्थी निकालो, फिरंगी राज्य मुर्दाबाद।’ सैनिकों में बढ़ती हुई इस विद्रोह की भावना को भांपकर सारे अंग्रेज अधिकारी अपने बीबी-बच्चों को लेकर रात में ही अलीगढ़ सैन्य छावनी से फरार हो गये।
          उक्त घटना के उपरांत देशभक्त जेल प्रहरियों ने जेल का फाटक खोलकर बन्दियों को जेल से मुक्त करा दिया। विद्रोही सैनिकों, जिनमें डाक बंगला के खासनामा रसूल खां और कोचवान मीर खां आदि ने विदेशी शासकों के निवास स्थान पर भारी लूट की। भले ही उस समय अलीगढ़ में मेजर एल्ड की 9 वीं रेजीमेंट के तीन सौ सैनिक मौजूद थे किन्तु, ये सब चुपचाप खड़े इस लूट का तमाशा देखते रहे।
          पंडित भीके नारायन की फांसी के उपरान्त कई दिन तक अलीगढ़ निवासियों ने अंग्रेजों दासता से मुक्त होकर चैन की सांस ली। आजादी की इस लड़ाई में पंडित भीके नारायन की शहादत को मंगल पांडेय की शहादत से कम करके नहीं आंका जा सकता है।
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रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग +रमेशराज

रोटियों से भी लड़ी गयी आज़ादी की जंग + रमेशराज ------------------------------------------------------------     कुछ कांग्...